True motivational story-क्या आप अपने काम से संतुष्ट हो ?

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क्या आप अपने काम से संतुष्ट हो ?

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क्या आप अपने काम से संतुष्ट हो ?

यह एक True motivational story है पिता और पुत्र की जिससे हमें यह सिख मिलती है की हमें हमारे कार्य कभी संतुष्ट नहीं होना चाहिए और हमेशा कार्य  को और और बेहतर बनाने की कोशिश करते रहना चाहिए –

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एक गांव में एक मूर्तिकार रहा करता था, वो बहुत खुबसूरत मूर्तियां बनाता था, और इस काम से वो अच्छा कमा लेता था | उसे एक बेटा हुआ, उस बच्चे ने बचपन से ही मूर्तियां बनाना शुरू कर दी, बेटा भी बहुत अच्छी मूर्तियां बनाया करता था और पिता अपने बेटे की कामयाबी पर खुश होता था, लेकिन हर बार बेटे की मूर्तियों में कोई न कोई कमी निकाल दिया करता था, वो कहता था, बहुत अच्छा बनाया पर अगली बार इस कमी को दूर करने की कोशिश करना, बेटा भी कोई शिकायत नहीं करता था, वो अपने पिता की सलाह पर अमल करते हुए अपनी मूर्तियों को और बेहतर बनाता रहा |

इस लगातार सुधार की वजह से बेटे की मूर्तियां पिता से भी अच्छी बनने लगी, और ऐसा वक़्त भी आया, जब लोग बेटे की मूर्तियों को बहुत पैसा देकर खरीदने लगे और पसंद करने लगे, जबकि उसके पिता की बनी मूर्तियां पहले वाली कीमत पर ही बिकती रही | पिता अब भी बेटे कि बने मूर्तियों में कमियां निकाल ही देता था, लेकिन बेटे को अब यह सब अच्छा नहीं लगता था | और वो बिना मन के उन कमियों को मानता था और अपनी मूर्तियों में बताई कमियों में सुधार कर देता था |

एक समय ऐसा भी आया, जब बेटे के सब्र ने जवाब दे दिया और उसके पिता, जब उसकी बनाई मूर्ति में कमी निकल रहे थे, तो बेटा बोला, आप तो ऐसे कहते हैं, जैसे आप बहुत बड़े मूर्तिकार हैं और आप को बहुत समझ होती तो आपकी मूर्तियां कम कीमत में नहीं बिकती | मुझे नहीं लगता की आपकी सलाह लेने की मुझे जरूरत है, मेरी मूर्तियां उत्तम है | पिता ने जब बेटे की यह बात सुनी तो उसने बेटे को सलाह देना और उसके काम मैं कमियां निकलना बंद कर दिया |

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कुछ समय तो वो लड़का बहुत खुश रहा, लेकिन फिर उसने ध्यान दिया कि लोग अब उसकी मूर्तियों की उतनी तारीफ नहीं करते जितनी पहले किया करते थे, और उसकी मूर्तियों के दाम बढ़ना भी बंद हो गए, शुरू में तो बेटे को कुछ समझ नहीं आया फिर वो अपने पिता के पास गया और अपनी इस समस्या के बारे में बताया, पिता ने भी बेटे की समस्या को बहुत शांति से सुना, जैसे की उसे पहले से ही पता था, की एक दिन ऐसा भी आएगा, बेटे ने भी इस बात पर ध्यान दिया और उसने पूछा क्या आप जानते थे, कि ऐसा होने वाला है, पिता ने कहा ! हाँ, क्योंकि आज से कई साल पहले मै भी इस हालत से गुजर चूका हूँ |

बेटे ने सवाल किया, की ये जानते हुए आपने मुझे समझाया क्यों नहीं ? पिता ने बोला – क्योंकि तुम समझना नहीं चाहते थे, मै जानता हूँ, की तुम्हारे जितनी अच्छी मूर्तियां मै नहीं बनाता, ये भी हो सकता हे, की मूर्तियों के बारे में मेरी सलाह गलत हो, और ऐसा भी नहीं हे की मेरी सलाह की वजह से कभी तुम्हारी मूर्ति बेहतर बनी हो, लेकिन में जब तुम्हारी मूर्तियों में कमियां दिखाता था, तब तुम अपनी बनाई मूर्तियों से संतुष्ट नहीं होते थे, तुम खुद को और बेहतर करने की कोशिश करते थे, और वही बेहतर करने की कोशिश तुम्हारी कामयाबी का कारण थी |

जिस दिन तुम अपने काम से संतुष्ट हो गए, और तुमने यह भी मान लिया की इसमें और बेहतर करने की गुंजाईश ही नहीं हे, तो तुम्हारे हुनर का विकास भी रुक गया, लोग हमेशा तुमसे बेहतर की उम्मीद करते हे, और यही कारण हे, की अब तुम्हारी मूर्तियों के लिए अब तारीफ नहीं मिलती और न ही ज्यादा पैसे मिलते हैं | बेटा कुछ समय शांत रहा और फिर उसने सवाल किया की अब मुझे क्या करना चाहिए, तो पिता एक वाक्य में उत्तर दिया – तुम्हे असंतुष्ट होना सीखना पड़ेगा, मान लो की तुम में बेहतर करने की गुंजाईश बाकि हे, यही एक बात तुम्हे हमेशा आगे बेहतर बनाने की प्रेरणा देती रहेगी |

प्रिय पाठक, उम्मीद है, आपको हमारा True motivational story – Series की यह प्रेरक कहानी पसंद आई होगी | कृपया शेयर करें | धन्यवाद,

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