Inspirational Success Story-एक मजदुर बच्चे की कहानी

Inspirational Success Story-

एक मजदुर बच्चे की कहानी

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यह Inspirational Success Story है  एक बच्चे के संघर्ष के बारे में है कि वह कैसे बन गया, एक बड़ी कंपनी का मालिक और कैसे उसे सफलता मिली।

मजदुर बच्चा कैसे बना एक बड़ी कम्पनी का मालिक

यह एक ऐसे व्यक्ति की कहानी है, जिसने यह साबित कर दिया, कि ऊंचाइयों तक पहुंचने के लिये सिर्फ एक बड़ी सोंच, उद्देश्य पूर्ति के लिए पक्का इरादा और कभी न हार मानने वाले जज्बे की आवश्यकता होती है | मुसीबत हमारी जीवन की एक सच्चाई है, कोई इस बात को समझ लेता है, तो कोई पूरी जिंदगी का रोना रोता है, जिंदगी के हर मोड़ पर हमारा सामना मुसीबतों से होता है | 

इसके बिना जिंदगी की कल्पना भी नहीं की जा सकती | आज के हमारी कहानी एक ऐसे शख्स के बारे में है, जिसके पास बचपन में दोस्तों के द्वारा दिए गए मुंबई जाकर कम तलाशने के सुझाव के अलावा कुछ नहीं था, जेब में बिना फूटी कौड़ी के, खाली पेट रहना और मुंबई के दादर स्टेशन पर सोने से ज्यादा तकलीफ देय है |

अपने पिता, भाई की कुछ ही दिन पहले हुए मौत के सदमे से बाहर आना, ऐसी परिस्थितियों के बाद भी आज सुदीप दत्ता ने जो सफलता हासिल की है, वो आज के युवाओं के लिए सच में बहुत प्रेरणादायक हैं, जो परिस्थितियों को दोष देकर हार मानकर बैठ जाते हैं | 

पश्चिम बंगाल के दुर्गापुर से संबंध रखने वाले इस बच्चे के पिता आर्मी में थे, 1971 की जंग में गोली लगने के बाद वो अपाहिज हो गए थे, और ऐसी स्थिती में बड़ा भाई ही परिवार के लिए उम्मीद का कारण था, लेकिन आर्थिक तंगी के चलते परिवार बड़े भाई का इलाज नहीं करवा सका और उसकी मृत्यु हो गई और उनके पिता भी अपने बड़े बेटे की मौत के सदमे में चल बसे, उसकी माँ उस बच्चे के लिए भावनात्मक सहारा जरूर थी |

लेकिन उसके उपर चार भाई बहनों की जितनी बड़ी जिम्मेदारी भी थी, अपने परिवार की जिम्मेदारी उसके ऊपर थी, उसके बाद दोस्तों के द्वारा दिया गया सुझाव तब सही साबित हुआ, जब उसे पंद्रह रुपये की मजदूरी का काम और सोने के लिए जगह मिली, सोने की जगह एक ऐसे कमरे में थी, जहाँ बीस मजदूर सोते थे, कमरा इतना छोटा था, कि सोते वक्त हिलने की भी जगह नहीं होती थी |

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दो साल की मजदूरी के बाद उसके जीवन में नया मोड़ तब आया जब नुकसान के चलते उसके मालिक ने फैक्टरी बंद करने का फैसला किया, ऐसी कठिन परिस्थिति में नई नौकरी ढूंढ़ने के बजाय फैक्टरी खुद चलाने का फैसला किया और सन 1991 मैं अपनी अब तक की बचाई पूंजी और किसी तरह दोस्तों से उधार लेकर सोलह हज़ार रुपए एकत्रित किये, लेकिन फैक्टरी खरीदने के लिए सोलह हज़ार की राशि बहुत कम थी |

लेकिन सुदीप ने दो साल का मुनाफा बांटने का वादा कर किसी तरह फैक्टरी मालिक को मना लिया, सुदीप उसी फैक्ट्री का मालिक बन चुका था, जहाँ कल तक वो सिर्फ एक मजदूर था | 19 साल का सुदीप जिस के लिए खुद का पेट भरने की चुनौती थी, उसने सात अन्य मज़दूरों के परिवार के घरो को चलाने की जिम्मेदारी ली |

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एल्यूमीनियम पैकेजिंग इंडस्ट्री उस समय अपने बुरे दौर से गुजर रही थी, जिंदल एल्यूमीनियम जैसे कुछ गिनी चुनी कंपनी अपनी आर्थिक मजबूती के आधार पर मुनाफा कर पा रही थी, सुदीप यह जान गए थे, कि बेहतर उत्पाद और नयापन ही उन्हें दूसरों से बेहतर साबित करेगा, लेकिन अच्छा विकल्प होने के बावजूद जिंदल जैसी कंपनी के सामने टिक पाना आसान नहीं था |

सुदीप ने वर्षो तक बड़े ग्राहकों को अपने उत्पादों की गुणवत्ता के बारे में समझाना जारी रखा और साथ ही छोटी कंपनियों के ऑर्डर्स के सहारे अपना बिज़नेस चलाते रहे, उनकी मेहनत तब रंग लाई जब उन्हें सनफार्मा, सिप्ला और नेस्ले जैसी बड़ी कंपनी से आर्डर मिलाना शुरू हुआ | सुदीप ने सफलता का स्वाद चखा ही था, लेकिन उन्हें आने वाली चुनौतियों का बिल्कुल अंदाजा नहीं था उद्योग जगत के वैश्विक दिग्गज अनिल अग्रवाल ने इंडियाफिर्ल नामक बंद पड़ी कंपनी खरीद कर पैकेजिंग क्षेत्रों में कदम रखा अनिल अग्रवाल और उनका वेदांत ग्रुप विश्व के चुनिंदा बड़ी कंपनियों में से एक रहे हैं, और उनके सामने टिक पाना भी नामुमकिन सा लक्ष्य था |

लेकिन वेदांता जैसी कंपनी से अप्रभावित रहकर सुदीप ने अपने उत्पादों को बेहतर बनाना जारी रखा, आखिरकार वेदांत समूह को सुदीप की दृढ़ता के सामने घुटने टेकने पड़े और इंडियाफर्ल कंपनी को सुदीप को ही बेचना पड़ा, इस डील के बाद वेदांत समूह पैकेजिंग इंडस्ट्री से हमेशा के लिए विदा हो गयी, इस उपलब्धि के बाद सुदीप ने अपनी कम्पनी को तेजी से आगे बढ़ाया और फार्मा कंपनियों के बीच अपनी पहचान बनाई | 

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सन् 1998 के 2000 तक उन्होंने 20 प्रोडक्शन यूनिट स्थापित कर दिए थे, आज सुदीप की कंपनी एस. डी. एलुमिनियम अपने क्षेत्र के नंबर वन कंपनी है, और साथ ही बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज और नेशनल स्टॉक एक्सचेंज की सूची में भी शामिल है. अपने अभिनव सोच के कारण उन्हें पैकेजिंग इंडस्ट्री का नारायणमूर्ति भी कहा जाता है|

जीवन में बहुत कुछ हासिल करने के बाद भी, सुदीप अपनी पृष्ठभूमि से जुड़े हैं, उनकी फैक्टरी के सारे मजदूर भी उन्हें ‘दादा’ कह कर बुलाते है, उन्होंने गरीबों और जरूरतमंदों की सहायता के लिए सुदीप दत्ता फाउंडेशन की स्थापना की जो ग्रामीण क्षेत्र के बेरोजगार युवाओं के लिए समय-समय पर नए अवसर प्रदान करता है | अक्सर देखा जाता है, कि हम लोग अपने दुखो के लिए हमेशा आंसू बहाते रहते हैं, और अपने अभाव को ही नसीब मानकर पूरा जीवन गुजार देते है |

लेकिन कुछ लोग ऐसे भी हैं, जो हालातों को अपना नसीब नहीं बनाते, बल्कि अपना नसीब खुद लिखते हैं |

प्रिय पाठक, उम्मीद है, आपको हमारा Inspirational Success Story – Series की यह प्रेरक कहानी पसंद आई होगी | कृपया शेयर करें | धन्यवाद्

 

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