विचारों की अद्भुत शक्ति – Inspirational story (Budhha)

विचारों की अद्भुत शक्ति

हम आज जो कुछ भी हैं, वह हमारे विचारों की अद्भुत शक्ति से है |

बुद्ध कहते है हम आज जो कुछ भी हैं, वह हमारे विचारों की अद्भुत शक्ति से है, जैसे हमारे विचार होते हैं, वैसे ही हम बनते हैं | वैसे देखें तो हम विचारों के अलावा कुछ और है भी नहीं, हम आज जो कुछ भी हैं, वह हमारे विचारों का संग्रह है, जब हम जन्म लेते हैं, तब हमारे भीतर इतनी विचार नहीं होते, एक विचार कभी-कभी बच्चे की मन में आ जाता है, बाल मन पूर्णता खाली होता है, और प्रफुल्ल्ति भी होता है, धीरे-धीरे मन का निर्माण होता है और विचारों की संख्या धीरे-धीरे बढ़ती चली जाती है |

विचार कितने और कैसे होंगे यह हमारी बुद्धि पर निर्भर करता है, एक बच्चे की बुद्धि का विकास, एक वयस्क व्यक्ति से कम होता है, इसलिए उसके विचार भी उस व्यक्ति के मुकाबले कम होते हैं, एक बच्चा दिन भर में अपने दोस्तों के साथ खेलता है, उनसे दोस्ती करता है, प्रेम करता है और कभी कभी नफरत भी करता है, लेकिन अगले ही पल फिर से उनसे दोस्ती करता है, और प्रेम करता है, उसके पास प्रेम तो बहुत होता है लेकिन नफरत थोड़ी ही होती है, लेकिन जब यही बालक बड़ा होता है, उसकी बुद्धि का विकास होता है, उसके मन का निर्माण पूरा होता है, और विचारों की प्रबलता अत्यधिक होती है |

तब यही बालक जो अब वयस्क व्यक्ति के रूप में है, अब उसमें प्रेम कम है, और नफरत ज्यादा है, अब वह हर किसी से दोस्ती नहीं दोस्ती करता, दोस्ती करते समय भी सोचता है, कि यह मेरे फायदे के लिए है या नहीं, अगर उसमें फायदा नजर नहीं आता, तो वह दोस्ती नहीं कर रहा है. उसका हर रिश्ता किसी ना किसी स्वार्थ पर ही टिका होता है |

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मैं यह नहीं कह रहा हूं, कि स्वार्थ बुरा होता है, स्वार्थ अच्छा भी होता है | आप अपने भाई से प्रेम करते है, आप चाहते हैं आपका भाई एक कामयाब इंसान बने, उसके लिए आप उसकी हर संभव मदद करते हैं, और आप सोचते हैं, कि इसमें आपका कोई स्वार्थ नहीं है, लेकिन जब वही भाई एक दिन आप से कहता है, कि आपने मेरे लिए किया ही क्या है, तब आपका दुख उत्पन्न होता है और आप सोचते हैं, कि जिस भाई के लिए मैंने इतना कुछ किया, उसने मुझे कुछ भी नहीं समझा |

आप जरा ध्यान से बैठकर सोचेंगे, कि अगर आपने निस्वार्थ भाव से रिश्ता निभाया था, तो यह दुःख कैसा ? क्योंकि जहां स्वार्थ होता है, वहां दुख जरूर होता है, आपको लगा कि आप निस्वार्थ भाव से भाई की मदद कर रहे हैं, लेकिन मन में एक विचार पड़ ही जाता है, कि भाई इसको समझेगा और वह सम्मान देगा | यही तो आप का स्वार्थ है, यह हर रिश्ते में होता है, इसलिए रिश्ते टूट जाते हैं, लेकिन जो रिश्ता निस्वार्थ भाव से जुड़ता है वह कभी नहीं टूटता |

बुद्ध कहते हैं, हमारे विचार ही हमें बनाते और बिगड़ते हैं, हम आज जो कुछ भी हैं, वह हमारे पूर्व विचारों का ही परिणाम है, जैसे विचार आज हमारे होंगे, हम वैसे ही भविष्य में बनेंगे, वास्तव मैं हमारा पूरा व्यक्तित्व विचारों से ही बना है, हम क्या सोच रहे हैं, क्या समझ रहे हैं, यह सब हमारे विचार ही हैं, अगर आप ध्यान से देखोगे तो आप पाओगे कि आप एक खास तरह की विचार रखते हैं, और जब कोई उन विचारों से अलग बातें करता है, तब आप उसका विरोध करते है, यही विचार आपकी सोच निर्धारित करते हैं, आज आप एक मजदूर है, नौकरी पेशा है, बड़े अधिकारी है, मंत्री है, मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री हैं, आप जो भी हैं, आपके विचारों का ही नतीजा है |

एक व्यक्ति मजदूर है यह उसके विचारों के कारण ही है, जब तक वह अपनी विचार नहीं बदलेगा वह मजदुर ही रहेगा | कुछ व्यक्ति रिस्क लेना नहीं चाहते, इसलिए हमेशा नौकरी ही ढूंढते हैं, वह सब कुछ सुन सकते हैं, चाहे उनका बोस उन्हें कुछ भी कहे लेकिन मैं नौकरी ही करेंगे, क्योंकि यही उनके विचार हैं | पूर्व में जो विचार उन्होंने ग्रहण किए थे, उसी के कारण उनका व्यक्तित्व ऐसा हो गया है, जो व्यक्ति अपने विचारों को बदलने की काबिलियत रखते हैं, वह अपना भविष्य भी बदल लेते हैं, लेकिन विचारों को बदलना इतना आसान भी नहीं होता |

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हजारों वर्षों पहले एक व्यक्ति को गुलाम बनाया गया, जब उसे गुलाम बनाया गया उससे पहले वह एक स्वतंत्र व्यक्ति था, उसके विचार स्वतंत्र थे, वह बहुत ही प्रतिभाशाली व रूपवान था और शक्तिशाली भी था, उसके सोचने और समझने की शक्ति भी अच्छी थी, वह ज्ञानवान था, तब एक दिन धोखे से उसे गुलाम बना लिया गया, उसके हाथ पैरों में जंजीर डाल दी गई, वह व्यक्ति कहने के लिए तो गुलाम था, लेकिन उसके विचार गुलाम नहीं थे, उसकी सोंच गुलाम नहीं थी, मगर जब उसकी अगली पीढ़ी यानि उसके पुत्र का जन्म हुआ, तब उसके पुत्र को भी उसके पिता से स्वतंत्र विचार मिले, लेकिन उसके पिता में और उसके पुत्र में एक अंतर था, उसके पिता ने आजादी स्वयं देखी थी, लेकिन उसके पुत्र ने नहीं |  

इसलिए वह पुत्र अपने पिता से कम ही रहा है. इस तरह उस व्यक्ति की पीढ़ियां आगे बढ़ती रही और धीरे-धीरे वह विचार जो स्वतंत्रता का था वह लुप्त हो गया और गुलामी के विचार मन में पड़ गए | हजारों सालों बाद इस व्यक्ति की जो पीढ़ी आई, उस पीढ़ी में हाथ-पैरों में तो जंजीरे नहीं थी, पर वह गुलाम ही थे, उनके विचार गुलामी वाले थे, वह कहीं भी अपनी बात रखने में असमर्थ थे, वह डरते थे  चुपचाप आदेशों का पालन करना ही उनका उद्देश्य बन गया था, वह इसी को अपनी स्वतंत्रता समझने लगे थे, क्योंकि गुलामी हमें तभी गुलामी लगेगी जब हमें इसका एहसास हो |

तब एक व्यक्ति ने उन्हें उनकी गुलामी का एहसास कराया और वे सभी उस व्यक्ति को ही दोष देने लगे और कहने लगे कि तुम हमारी स्वतंत्रता छीन लेना चाहते हो, हमारा यही कर्म और कार्य है यही हमारा जीवन उद्देश्य है, तुम हमें पथभ्रष्ट करना चाहते हो |

लेकिन उनमें से केवल एक ही व्यक्ति को उस व्यक्ति की बात समझ में आई, की विचारों की अद्भुत शक्ति होती है, लेकिन क्या वह व्यक्ति उस व्यक्ति की बात सुनकर तुरंत ही स्वतंत्र विचारों का व्यक्ति हो जाएगा, क्या उसके अंदर से गुलामी की भावना निकल जाएगी ? ऐसा नहीं है, कुछ विचार हजारों सालों के बाद पीड़ियों में आते हैं, और वह  एकदम से ना तो आते हैं और ना ही एकदम से जाते हैं |

लेकिन जरूरी है, कि स्वतंत्रता का एक बीज मन में जरूर पढ़ें, तब उसके आने वाली पीढ़ियां जरूर स्वतंत्र हो जाएंगी, इसके विपरीत कुछ विचार अस्थाई होते हैं, आते जाते रहते हैं, जैसे – आशा और निराशा का विचार, यह विचार उस गुलाम व्यक्ति को भी आएगा और एक स्वतंत्र व्यक्ति को भी आएगा, यह विचार रोज बनते और बिगड़ते रहते हैं, यह पूरी दुनिया विचारों से ही चल रही है, यही विचार शांति का सन्देश  देते हैं और यही विचार युद्ध भी देते हैं | 

इसलिए बुद्ध कहते हैं, कि जैसे हमारे विचार होंगे वैसा ही परिणाम होगा, हमारी विचार हमारे मन का परिणाम है, हमारा मन शरीर के माध्यम से करोड़ों सूचना एकत्रित करता है, उन सूचनाओं के आधार पर वह विचारों का निर्माण करता है, यह निर्माण मन की गहराइयों में होता है, वहां पर एक तरंग उत्पन्न होती है, यह विचार तरंग होती है, आगे चलने पर यह विचार एक रूप लेता है, अच्छा या बुरा, इसमें आपकी पूर्व विचारधारा, आपका सामाजिक वातावरण ,आपकी परवरिश, आपका जान, आपका अज्ञान, आपका जेनेटिक व्यवहार सहयोग करता है, उसके बाद मन उस विचार को तराशता है और वह विचार आप तक पहुंचाता है, आप उस विचार को प्रकट कर देते हैं |

आपको ऐसा लग सकता है, जो विचार अभी-अभी आपने प्रकट किया है, वह विचार अभी-अभी किसी बात से निकल कर आया है, लेकिन ऐसा नहीं है, जो भी विचार आप प्रकट कर रहे हैं, आप तक पहुंचने से पहले ही वह मन के अंदर तैयार हो जाता है, आप तक तो वह बहुत बाद मैं आता है, इससे पहले वह मन की कई स्तर से गुजरता है, आप तो केवल उस विचार को, जो मन ने तैयार किया है, उसे केवल प्रकट करते हैं और तब आपको पता चलता है, कि आप क्या अहसास कर रहे हैं, अच्छा या बुरा ?  

बुद्ध कहते हैं – कि ध्यान पूर्वक अपने विचारों को देखो, देखो कि वह विचार तुम्हारे अंदर क्यों उठ रहे हैं, और विचारों का तुम पर क्या प्रभाव हो रहा है, अभी कुछ पल पहले आप खुश थे और कुछ क्षण बाद आप दुखी हो गए, ऐसा क्यों हुआ ? इसको देखें ना कि उस खुशी और दुख में बह जाए, एक जागृत व्यक्ति का अपने मन की तरंगों पर नियंत्रण होता है, इसलिए विचार उस व्यक्ति पर नियंत्रण नहीं कर पाते, यही व्यक्ति विचारों पर नियंत्रण कर लेता है, विचारों के प्रकट होने से पहले ही वह विचारों को समझ लेता है |

आप अच्छे बनते हैं, अगर आप अच्छे विचारों के साथ जीते हैं, आप बुरे बनते हैं, अगर आप बुरे विचारों के साथ जीतें है | अच्छे विचार अच्छे लोगों को आप तक पहुंचाते हैं, अच्छी बातों तक आपको ले जातें  है, अच्छे कर्म की ओर आपको अग्रसर करते हैं |

विचारों की अद्भुत शक्ति है, इसे आपको जानना है, बुरे विचार बुरे लोगों की तरफ खींचते हैं, बुरी चीजों को आप तक पहुंचाते हैं, बुरे कर्म आप से करवाते है इसलिए अपने विचारों को समझें, उनमें बह ना जायें |

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